रमज़ान क्या है

इस्लाम में रमजान का बहुत ही महत्त्व है, क्योकि इस महीने में ही, मुसलमानो की पाक किताब ‘क़ुरआन’ नाज़िल हुई थी। (दुनिया में लायी गयी थी)

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इस्लाम Lunar Calender यानी की चैत्रमा के हिसाब से तारिख मानते हैं, जिसमें एक साल में १२ महीने होते हैं, हर दिन या तोह 29 का या फिर 30 का होता है, जो चाँद पर निर्भर करता है।

रमज़ान भी एक महीने का नाम है, इस महीने में दुनिया के तमाम मुसलमानो को रोज़ा रखने के लिए बताया गया हैं।

रमज़ान इस्लामिक calander का 9th महीना है, रमदान एक अरबिक  मतलब होता है सूरज की गर्मी।

रोज़े की हालत में मुसलमानो को बहुत सी चीज़ों से परहेज़ करना होता है,

उसमे से पहला है की आप सूरज के निकलने से लेकर सूरज के डूबने तक न कुछ खा सकते हैं और न ही कुछ पि सकते हैं।

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इसके अल्वा, बीच काफी चीज़ों से परहेज़ बताया गया है, जैसे किसी  कहना, गाली देना, किसी पर बुरी नगाह डालना इत्यादि।

यह सब तोह वैसे भी मन हैं मगर रमज़ान के महीने में सख्त मन है जिसे तमाम मुसलमान मानते हैं।

इन सब चीज़ों का उद्देश्य यह है की इंसान को सब्र करने की सीख मिले, ग़रीबो की ज़िन्दगी का एहसास हो।

महीने में मुसलमान अन्ते हैं की हर नेकी (अच्छाई) का 70 गुना सवाब (पुण्य) मिलता है।  इसलिए इसे इबादत का महीना भी कहाँ जाता है।

सेहरी और इफ्तार क्या होती है

सुबह सूरज निकलने से पहले / रोज़ा रखने से पहले कुछ खाने को सेहरी केहरे हैं जो शब्द सहर से आया है जिसका मद्ळात होता है सुबह।

पूरे दिन बिना खाये रहने के लिए सेहरी में कुछ खाने और पानी पीने को कहाँ जाता है ताकि दिन भर में तबियत खराब न हो।

उसी तरह शाम को सूरत डूबने के बाद, रोज़ा खोलने के लिए कुछ खाने को इफ्तार कहते हैं,

रोज़ा रखना किस किस के लिए ज़रूरी है

हर वह मुस्लमान आदमी या औरत, जो अपना ख़याल रख सकता है उसपर रोज़ा फ़र्ज़ है, कोई उम्र नहीं बताई गयी है मगर कुछ लोगों ने 10 उम्र तय की है जिसके बाद रोज़ा फ़र्ज़ हो जाता है।

मगर कुछ हालातों में रोज़ा माफ़ भी है, जैसे बक्च्चो को तोह बिलकुल माफ़ है, बीमार और बूढ़ों को, जो ज़्यादा देर तक भूखे नहीं रह सकते, या pregnant औरतों को या जिनके periods हो, इन लोगो के लिए रोज़ा न रखने की छूट दी गयी है,

मगर बाद में साल में कभी भी जितने रोज़े छोटे हैं उनको रखने के लिए बताया गया है।

रोज़ा केवल  केवल भूखे रहना नहीं है

कुछ लोग समझते हैं की रमज़ान का मतलब सिर्फ दिन में खाना न खाना है, मगर असल में यह इबादत का महीना है।

क्योकि इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ था, इस महीने में पूरा क़ुरआन पढ़ा और सुना जाता है।

ईशा की नमाज़ के बाद, जो दिन की पांचवी और आखिरी नमाज़ होती है, क़ुरआन तरावीह की नमाज़ में पढ़ा जाता हैं और कुल २० रकातों की होती है।

और तविह में पूरा क़ुरआन 20 दिन में या उसके बाद किसी भी दिन पूरा किया जाता है।

मगर तरावीह पुरे महीने चलती है जबतक ईद का चाँद न दिख जाये और अगले दिन ईद का ऐलान न हो जाए।

रमज़ान के आखीर में ज़कात निकालना

रमजान के बाद हर उस मुसलमान को, जो कमाता है, अपनी कमाई का 2.5% ज़कात निकलना होता है, जो की गरीबों का हक़ होता है, और गरीबों में बाँट दिया जाता है,

लोग या तोह खुद से ही किसी गरीब को दे सकते हैं, या फिर ये पैसा मस्जिद में सबसे जमा करवा कर गरीबों में बायंट दिया जाता है।

रमज़ान के बाद ईद का त्यौहार

पूरे 29 या 30 दिन रोज़ा रखने के बाद जब चाँद दिख जाता है तोह ईद का ऐलान होता है।

चेक करें : Jaaniye.com/food

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इस त्यौहार को तोह सब अच्छे से जानते हैं, मिठाइयां बनती हैं, सेवइयां बनती हैं और सब एक दुसरे के घर आते हैं,